हुजूम-ए-ग़म में घिरा हुआ हूँ हुज़ूर मेरा ख़याल रखिए
हुजूम-ए-ग़म में घिरा हुआ हूँ, हुज़ूर ! मेरा ख़याल रखिए
मैं दर पे कब से पड़ा हुआ हूँ, हुज़ूर ! मेरा ख़याल रखिए
न कोई हमदम, न कोई साथी, किसे मैं रूदाद-ए-ग़म सुनाऊँ
मैं बे-सहारा पड़ा हुआ हूँ, हुज़ूर ! मेरा ख़याल रखिए
मेरे हैं चारों तरफ़ मसाइल, है रूह अंदर से मेरी घाइल
मैं ठोकरों में पला हुआ हूँ, हुज़ूर ! मेरा ख़याल रखिए
उदास लम्हों में जी रहा हूँ, मैं तल्ख़ मौसम को पी रहा हूँ
मैं आँसुओं से बुना हुआ हूँ, हुज़ूर ! मेरा ख़याल रखिए
कहीं ये मुझ को जला न डाले, जला के मुझ को बुझा न डाले
मैं आब-ए-ज़र से डरा हुआ हूँ, हुज़ूर ! मेरा ख़याल रखिए
मैं हर्फ़-ए-मतलब सजा के तिश्ना लबों पे लाया हूँ, मेरे आक़ा !
मैं ‘उम्र भर का लुटा हुआ हूँ, हुज़ूर ! मेरा ख़याल रखिए
रियाज़ शा’इर हूँ आप का मैं, अदब से दर पर खड़ा हूँ कब से
यहाँ मक़ामी बना हुआ हूँ, हुज़ूर ! मेरा ख़याल रखिए
शायर:
रियाज़ हुसैन चौधरी
ना’त-ख़्वाँ:
असद रज़ा अत्तारी
सय्यिद ज़बीब मसूद
अली शब्बीर