जब गुंबद-ए-ख़िज़रा पे वो पहली नज़र गई

जब गुंबद-ए-ख़िज़रा पे वो पहली नज़र गई
आँखों के रास्ते मेरे दिल में उतर गई

सर ख़म था, लब ख़मोश थे, आँखें थीं अश्कबार
इक साअत-ए-बेदार थी जो कि गुज़र गई

दिल भी है शाद शाद, तबीयत है पुर-बहार
लगता है आज मेरी मदीने ख़बर गई

बरसी थी इस क़दर कि नहा सा गया उधर
वो बारिश-ए-करम मेरे दामन को भर गई

जो कह सका न लब से, मिली वो मुराद भी
मेरे सुकूत पर भी शहा की नज़र गई

तैबा से लौटना किसी आशिक़ से पूछिये
ऐसा है जैसे रूह बदन से गुज़र गई

आवाज़ ‘उबैद’ तेरी ब-फ़ैज़ान-ए-नात ही
सीनों में आशिक़ान-ए-नबी के उतर गई

मर कर भी न मरूँगा मैं अल्लाह की क़सम
यह जान उनके ज़िक्र में मेरी अगर गई

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