मुहर्रम में क्या जाइज़ ? क्या नाजाइज़?

 

📚मुहर्रम में क्या जाइज़ ?, क्या नाजाइज़ ?

✍🏼मौलाना ततहीर अहमद रज़वी बरेलवी

पोस्ट:- 1

प्यारे इस्लामी भाईयों! मज़हबे इस्लाम में एक अल्लाह की इबादत ज़रूरी है साथ ही साथ उसके नेक बंदों से मुहब्बत व अक़ीदत भी जरूरी है। अल्लाह के नेक अच्छे और मुक़द्दस बंदों से असली, सच्ची और हक़ीक़ी मुहब्बत तो ये है कि उनके ज़रिए अल्लाह ने जो रास्ता दिखाया है उस पर चला जाए, उनका कहना माना जाए, अपनी ज़िंदगी को उनकी ज़िंदगी की तरह बनाने की कोशिश की जाए, इसके साथ साथ इस्लाम के दायरे में रहकर उनकी याद मनाना, उनका ज़िक़्र और चर्चा करना, उनकी यादगारें क़ाइम करना भी मुहब्बत व अक़ीदत है। और अल्लाह के जितने भी नेक और बरगुज़ीदा बंदे है उन सब के सरदार उसके आखिरी रसूल हज़रत मुहम्मद सलल्ललाहु तआला अलैहि वसल्लम हैं। उनका मर्तबा इतना बड़ा है कि वो अल्लाह के रसूल होने के साथ साथ उसके महबूब भी है। और जिस को दीन व दुनियां में जो कुछ भी अल्लाह ने दिया, देता है, और देगा, सब उन्हीं का ज़रीया, वसीला और सदक़ा है। उनका जब विसाल हुआ, और जब दुनियां से तशरीफ़ ले गए तो उन्होंने अपने क़रीबी दो तरह के लोग छोड़े थे। एक तो उनके साथी जिन्हें सहाबी कहते हैं। उनकी तादाद हुज़ूर सलल्ललाहु तआला अलैहि वसल्लम के विसाल के वक़्त एक लाख से भी ज़्यादा थी। दूसरे हुज़ूर की आल व औलाद और आप की पाक बीवियाँ उन्हें अहले बैत कहते हैं, हुज़ूर के इन सब क़रीबी लोगों से मुहब्बत रखना मुसलमान के लिए निहायत ज़रुरी है हुज़ूर के अहले बैत हों या आप के सहाबी उन में से किसी को भी बुरा भला कहना या उनकी शान में गुस्ताख़ी और बे अदबी करना मुसलमान का काम नहीं है, ऐसा करने वाला गुमराह व बद दीन है उसका ठिकाना जहन्नम है।

📚(मुहर्रम में क्या जाइज ?, क्या नाजायज़? सफ़हा 3, 4)

 

हुज़ूर के अहले बैत में एक बड़ी हस्ती इमाम आली मक़ाम सय्येदिना “इमाम हुसैन” भी हैं उनका मर्तबा इतना बड़ा है कि वो हुज़ूर के सहाबी भी हैं, और अहले बैत में से भी हैं, यानी आपकी प्यारी बेटी के प्यारे बेटे आप के प्यारे और चहीते नवासे हैं। रात रात भर जाग कर अल्लाह की इबादत करने वाले और क़ुरआने अज़ीम की तिलावत करने वाले मुत्तक़ी, इबादत गुज़ार, परहेज़गार, बुज़ुर्ग अल्लाह के बहुत बड़े वली हैं, साथ ही साथ मज़हबे इस्लाम के लिए राहे ख़ुदा में गला कटाने वाले शहीद भी हैं। मुहर्रम के महीने की 10 तारीख़ को जुमा के दिन 61 हिजरी में यानी हुज़ूर के विसाल के तक़रीबन 50 साल के बाद आपको और आपके साथियों और बहुत से घर वालों को ज़ालिमों ने ज़ुल्म करके करबला नाम के एक मैदान में 3 दिन प्यासा रख कर शहीद कर दिया। इस्लामी तारीख़ का ये एक बड़ा सानिहा और दिल हिला देने वाला हादसा है, और 10 मुहर्रम जो कि पहले ही से एक तारीख़ी और यादगार दिन था इस हादसे ने इसको और भी जिंदा व जावेद कर दिया, और उस दिन को हज़रत इमाम हुसैन के नाम से जाना जाने लगा, और गोया कि ये हुसैनी दिन हो गया, और बेशक ऐसा ही होना चाहिए। लेकिन मजहबे इस्लाम एक सीधा सच्चा संज़ीदगी और शराफ़त वाला मज़हब है, और उसकी हदे मुकर्रर हैं, लिहाज़ा इसमें जो भी हो सब मज़हब और शरीयत के दायरे में रहकर हो तभी वो इस्लामी बुज़ुर्गों की यादगार कहलाएगी, और जब हमारा कोई भी तरीक़ा मजहब की लगाई चहार दीवारी से बाहर निकल गया, तो वो ग़ैर इस्लामी और हमारी बुज़ुर्ग शख़्सियतों के लिए बाइसे बदनामी हो गया। हम जैसा करेंगे हमे देख कर दूसरे मज़हबों के लोग यही समझेंगें कि इनके बुज़ुर्ग भी ऐसा करते होंगे, क्योकि क़ौम अपने बुजुर्गों और पेशवाओ का तआरुफ़ होती है, हम अगर नमाज़े, क़ुरआन की तिलावत करेंगें, जुए, शराब गाने बजाने और तमाशों से बच कर ईमानदार, शरीफ़ और भले आदमी बनकर रहेंगे, तो देखने वाले कहेंगे कि जब ये इतने अच्छे हैं तो इनके बुज़ुर्ग कितने अच्छे होंगें, और जब हम इस्लाम के ज़िम्मेदार ठेकेदार बनकर इस्लाम और इस्लामी बुजुर्गों के नाम पर ग़ैर इंसानी हरकतें नाच कूद और तमाशे करेंगें तो यक़ीनन जिन्होंने इस्लाम का मुतालअ नहीं किया है उनकी नज़र में हमारे मज़हब का गलत तआरुफ़ होगा, और फिर कोई क्यों मुसलमान बनेगा?

📚(मुहर्रम में क्या जाइज?, क्या नाजायज़? सफा नं० 4,5)

 

हुसैनी दिन यानी 10 मुहर्रम के साथ भी कुछ लोगो ने यही सब किया, और इमाम हुसैन के किरदार को भूल गए, और इस दिन को खेल तमाशों, ग़ैर शरई रसूम नाच गानों, मेलों, ठेलों और तफरीहों का दिन बना डाला। और ऐसा लगने लगा कि जैसे इस्लाम भी माअज़ल्लाह दूसरे मज़हबों की तरह खेल तमाशों तफरीहों और रंग रिलियों वाला मज़हब है।
ख़ुद को मुसलमान कहने वालों में एक नाम निहाद इस्लामी फ़िरक़ा ऐसा भी है कि उनके यहाँ नमाज़ रोज़े वगैरह अहकामे शरअ और दीनदारी की बातों को तो कोई ख़ास अहमियत नहीं दी जाती बस मुहर्रम आने पर रोना, पीटना, चीखना, चिल्लाना, कपड़े फाड़ना, मातम व सीना कोबी करना ही उन का मज़हब है गोया कि उनके नज़दीक अल्लाह तआला ने अपने रसूल को इन्हीं कामों को करने और सिखाने को भेजा था, और इन्हीं सब बेकार बातों का नाम इस्लाम है।
मज़हबे अहले सुन्नत वलजमाअत में से भी बहुत से अवाम कुछ राफ़ज़ियों के असरात और कुछ हिंदुस्तान के पुराने ग़ैर मुस्लिमों जिन के यहाँ धर्म के नाम पर जुए खेले जाते हैं, शराबें पी जाती हैं, जगह जगह मेले लगा कर खेल तमाशों ढोल, बाजे, वगैरह ग़ैर इस्लामी काम कराये जाते हैं, उनकी सोहबतों में रहकर उनके पास बैठने उठने, रहने सहने के नतीज़े में खेल तमाशे और वाहियात भरे मेले को ही इस्लाम समझने लगे, और बांस, कागज़ और पन्नी के मुजस्सिमे बना कर उनपर चढ़ावे चढ़ाने लगे।
दरअसल होता ये है कि ऐसे कामों कि जिन में लोगों को ख़ूब मज़ा और दिल चस्पी आये, तफरीह और चटखारे मिले उनका रिवाज़ अगर कोई डाले तो वो बहुत जल्दी पढ़ जाती है, और क़ौम बहुत जल्दी उन्हें अपना लेती है, और जब धर्म के ठेकेदार उनमे सवाब बता देते हैं तो अवाम उन्हें और भी मज़ा लेकर करने लगते हैं कि ये ख़ूब रही, रंगरलियां भी हो गई और सवाब भी मिला, तफरीह और दिल लगी भी हो गई खेल तमाशे भी हो गए और जन्नत का काम, क़ब्र का आराम भी हो गया। मौलवी साहब या मियाँ हुज़ूर ने कह दिया है कि सब जाइज़ व सवाब का काम है ख़ूब करो, और हमने भी ऐसे मौलवी साहब को खूब नज़राना देकर ख़ुश कर दिया है, और उन्होंने हम को तअज़िये बनाने घुमाने, ढोल बजाने और मेले ठेले लगाने और उनमें जाने की इजाज़त दे दी है अल्लाह नाराज़ हो या उस का रसूल ऐसे मौलवियों और पीरों से हम ख़ुश और वो हमसे ख़ुश।

📚 मुहर्रम में क्या जाइज?, क्या नाजायज़? सफा नं० 5, 6, 7)

 

इस सब के वाबजूद अवाम में ऐसे लोग भी काफ़ी हैं जो गलती करते हैं और इसको गलती समझते भी हैं और इस हराम को हलाल बताने वाले मौलवियों की भी उनकी नज़र में कुछ औक़ात नहीं रहती। एक गॉव का वाकिया है कोई ताज़िये बनाने वाला कारीगर नहीं मिल रहा था या बहुत सी रक़म का मुतालबा कर रहा था वहाँ की मस्जिद के इमाम ने कहा कि किसी को बुलाने की ज़रूरत नहीं है ताज़िया मैं बना दूंगा और इस इमाम ने गांव वालों को ख़ुश करने के लिए बहुत उम्दा बढ़िया और खूबसूरत ताज़िया बना कर दिया और फिर उन्हीं ताजियेदारों ने इस इमाम को मस्जिद से निकाल दिया और ये कहकर इस का हिसाब कर दिया कि ये कैसा मौलवी है कि ताज़िया बना रहा है मौलवी तो ताज़ियेदारी से मना करते हैं, और मौलवी साहब का बक़ौल शाइर ये हाल हुआ कि:
“न ख़ुदा ही मिला न विसाले सनम”
“न यहाँ के रहे न वहाँ के रहे”
दरअसल बात ये है कि सच्चाई में बहुत ताक़त है हक़ हक़ ही होता है। और सर चढ़ कर बोलता है और हक़ की अहमियत उनके नज़दीक भी होती है जो ना हक़ पर हैं।
बहरे हाल इस में कोई शक नहीं कि एक बड़ी तादाद में हमारे सुन्नी मुसलमान अवाम भाई हज़रत इमाम हुसैन रदियल्लाहु तआला अन्हु की मुहब्बत में गलत फहमियों के शिकार हो गए और मज़हब के नाम पर नाजाइज़ तफरीह और दिल लगी के काम करने लगे उनकी गलत फहमियों को दूर करने के लिए हमने ये मज़मून मुरत्तब किया है इस मुख्तसर मज़मून में इस्लाम व सुन्नियत के नाम पर जो कुछ होता है इस मे इस्लामी नुक़्ता ए नज़र से सुन्नी उलमा के फतवों के मुताबिक़ जाइज़ क्या है और नाजाइज़ क्या है, किस में गुनाह है और किस में सवाब। इस में बहस व मुबाहिसे और तफसील की तरह न जाकर सिर्फ जाइज़ और नाजाइज़ कामों का एक जायज़ा पेश करेंगे, और पढ़ने और सुनने वालों से गुजारिश है कि ज़िद और हठ धर्मी से काम न लें, मौत क़ब्र और आख़िरत को पेशे नज़र रखें।
मेरे अज़ीज़ इस्लामी भाइयों! हम सब को यक़ीनन मरना है, और खुदा ए तआला को मुंह दिखाना है वहां ज़िद और हठ धर्मी से काम नहीं चलेगा। भाइयों! आंखें खोलो और मरने से पहले होश में आ जाओ और पढ़ो समझो और मानों।

📚 (मुहर्रम में क्या जाइज?, क्या नाजायज़? सफा नं० 7, 8, 9)

 

📋 मुहर्रम में क्या जाइज़❓

हम पहले ही लिख चुके हैं कि हज़रत इमाम हुसैन हों या दूसरी अज़ीम इस्लामी शख्सियतें उनसे असली सच्ची हक़ीक़ी मुहब्बत व अक़ीदत तो ये है कि उनके रास्ते पर चला जाए, और उनका रास्ता “इस्लाम” है। पांचों वक़्त की नमाज़ की पाबंदी की जाए, रमज़ान के रोज़े रखे जाएं, माल की ज़कात निकाली जाए, बस की बात हो तो ज़िन्दगी में एक मर्तबा हज भी किया जाए, जुए, शराब, ज़िना, सूद, झूंठ, ग़ीबत फ़िल्मी गानों, तामाशों और पिक्चरों वगैरह नाजाइज़ हराम कामो से बचा जाए, और उसके साथ साथ उनकी मुहब्बत व अक़ीदत में मुन्दरज़ा ज़ैल काम किये जाएं तो कुछ हर्ज़ नहीं बल्कि बाइसे खैर व बरक़त है।

📚 (मुहर्रम में क्या जाइज़, क्या नाजाइज़ सफा न०- 9)

 

📋 न्याज़ व फ़ातिहा…….1

हज़रत इमाम हुसैन रदियल्लाहु तआला अन्हु और जो लोग उनके साथ शहीद किये गए उनको सवाब पहुंचाने के लिए सदक़ा व ख़ैरात किया जाए, ग़रीबों, मिस्कीनों को या दोस्तों, पड़ोसियों, रिश्तेदारों वगैरह को शर्बत या खिचडे या मलीदे वगैरह कोई भी खाने पीने की चीज़ खिलाई या पिलाई जाए, और उसके साथ आयाते कुरआनिया की तिलावत कर दी जाए तो और भी बेहतर है इस सब को उर्फ़ में नियाज़ फ़ातिहा कहते हैं, ये सब बिला शक जाइज़ और सवाब का काम है, और बुजुर्गों से इज़हारे अक़ीदत व मुहब्बत और उन्हें याद रखने का अच्छा तरीक़ा है लेकिन इस बारे में चंद बातों पर ध्यान रखना ज़रूरी है।
➡️ न्याज़ व फ़ातिहा किसी भी हलाल और जाइज़ खाने पीने की चीज़ पर हो सकती है उसके लिए शर्बत, खिचड़े और मलीदे को ज़रूरी ख़्याल करना जिहालत है अलबत्ता इन चीजों पर फ़ातिहा दिलाने में कोई हर्ज़ नहीं है अगर कोई इन मज़कूरा चीज़ों पर फ़ातिहा दिलाता है तो वो कुछ बुरा नहीं करता, हां जो उन्हें ज़रूरी ख्याल करता है उनके एलावा किसी और खाने पीने की चीज़ पर मुहर्रम में फ़ातिहा सही नहीं मानता वो ज़रूर जाहिल है।
➡️ नियाज़ फ़ातिहा में शेख़ी ख़ोरी नहीं होना चाहिए और न खाने पीने की चीज़ों मे एक दूसरे से मुक़ाबला। बल्कि जो कुछ भी हो और जितना भी हो सब सिर्फ़ अल्लाह वालों के ज़रिए अल्लाह तआला की नज़दीकी और उसका कुर्ब और रज़ा हासिल करने के लिए हो, और अल्लाह के नेक बंदों से मुहब्बत इस लिए की जाती है कि उनसे मुहब्बत करने और उनके नाम पर खाने खिलाने और उनकी रूहों को अच्छे कामों का सवाब पहुँचाने से अल्लाह राज़ी हो, और अल्लाह को राजी करना ही हर मुसलमान की जिंदगी का असली मक़सद है।
➡ ️नियाज़ फ़ातिहा बुज़ुर्गों की हो या बडे बूढो की उस के तौर तऱीके जो मुसलमानो में राइज़ हैं जाइज़ और अच्छे काम हैं फ़र्ज़ और वाज़िब यानी शरअन लाज़िम व ज़रूरी नहीं अगर कोई करता है तो अच्छा करता है और नहीं करता है तब भी गुनेहगार नहीं, हां कभी भी बिल्कुल न करना महरूमी है। नियाज़ व फ़ातिहा को न करने वाला गुनेहगार नहीं है, हां इससे रोकने और मना करने वाला जरूर गुमराह व बद मज़हब है और बुजुर्गों के नाम से जलने वाला है।
➡️ नियाज़ व फ़ातिहा के लिए बाल बच्चों को तंग करने की या किसी को परेशान करने की या ख़ुद परेशान होने की या उन कामों के लिए कर्ज़ा लेने की या ग़रीबों, मज़दूरों से चंदा करने की कोई ज़रूरत नहीं, जैसा और जितना मौक़ा हो उतना करें और कुछ भी न हो तो ख़ाली क़ुरआन या कलमा ए तय्यब या दुरुद शऱीफ वगैरह का ज़िक्र करके या नाफ़िल नमाज़ या रोज़े रखकर सवाब पहुंचा दिया जाए तो ये भी काफी है, और मुकम्मल नियाज़ और पूरी फ़ातिहा है, जिस में कोई कमी यानी शरअन ख़ामी नहीं है। ख़ुदा ए तआला ने इस्लाम के ज़रिए बंदों पर उनकी ताक़त से ज़्यादा बोझ नहीं डाला। ज़कात हो या सदक़ा ए फित्र और क़ुर्बानी सिर्फ उन्हीं पर फ़र्ज़ व वाज़िब हैं जो साहिबे निसाब यानी शरअन मालदार हों। हज भी उसी पर फ़र्ज़ किया गया जिस के बस की बात हो, अक़ीक़ा व वलीमा उन्हीं के लिए सुन्नत है जिनका मौक़ा हो जब कि ये काम फ़र्ज़ व वाज़िब या सुन्नत हैं, और नियाज़ व फ़ातिहा उर्स वगैरह तो सिर्फ बिदआते हसना यानी सिर्फ अच्छे और मुस्तहब काम हैं, फ़र्ज़ व वाज़िब नहीं हैं यानी शरअन लाज़िम व जरूरी नहीं हैं। फिर नियाज़ व फ़ातिहा के लिए क़र्ज़ लेने, परेशान होने और बाल बच्चों को तंग करने की क्या जरूरत है बल्कि हलाल कमाई से अपने बच्चों की परवरिश करना बजाते ख़ुद एक बड़ा कारे ख़ैर सवाब का काम है।

📚 (मुहर्रम में क्या जाइज़, क्या नाजाइज़, सफहा न०- 9, 10, 11, 12)

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